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06 Sep 2026
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रसोई के बजट पर बढ़ते बोझ को लेकर जिला कांग्रेस कमेटी सरगुजा ने विवेकानंद प्रतिमा के सामने सत्याग्रह कर केंद्र सरकार के खिलाफ किया विरोध प्रदर्शन,

रसोई के बजट पर बढ़ते बोझ को लेकर जिला कांग्रेस कमेटी सरगुजा ने विवेकानंद प्रतिमा के सामने सत्याग्रह कर केंद्र सरकार के खिलाफ किया विरोध प्रदर्शन,
रसोई के बजट पर बढ़ते बोझ को लेकर जिला कांग्रेस कमेटी सरगुजा ने विवेकानंद प्रतिमा के सामने सत्याग्रह कर केंद्र सरकार के खिलाफ किया विरोध प्रदर्शन,। फोटो: आज का दिन न्यूज़

अंबिकापुर । रसोई के बजट पर बढ़ते बोझ को लेकर जिला कांग्रेस कमेटी सरगुजा ने गुरुवार को विवेकानंद प्रतिमा के सामने सत्याग्रह कर केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध जताया। जिला कांग्रेस अध्यक्ष बालकृष्ण पाठक के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रैली निकाली और शक्कर की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। हालांकि, कांग्रेस ने कीमतों में 40 से 78 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने का दावा किया है, जबकि उपलब्ध ताजा बाजार रिपोर्टों में विभिन्न शहरों में खुदरा कीमतें लगभग 60 से 75 रुपये प्रति किलो तक बताई गई हैं। 2 सितंबर तक अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमत में कुछ गिरावट आकर करीब 62.57 रुपये प्रति किलो दर्ज की गई थी।

कांग्रेस का आरोप…नीतियों का खामियाजा उपभोक्ता भुगत रहा :

कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र की नीतियों के कारण घरेलू बाजार में शक्कर की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव बढ़ा है। पार्टी ने इथेनॉल के लिए गन्ने/शक्कर के डायवर्जन, शक्कर के निर्यात और घरेलू स्टॉक को लेकर सरकार की नीति पर सवाल उठाए। लेकिन इस आरोप पर सरकार का पक्ष अलग है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा मूल्य वृद्धि को केवल इथेनॉल डायवर्जन से जोड़ना सही नहीं है। सरकार के अनुसार इथेनॉल के लिए डायवर्जन का हिस्सा 2022-23 के करीब 12′ से घटकर 2025-26 में करीब 9′ हुआ है। सरकार ने कीमत बढ़ने के पीछे कम उत्पादन, त्योहारी मांग, मौसम से फसल को नुकसान, वैश्विक आपूर्ति और कुछ व्यापारियों/मिलों द्वारा जमाखोरी-सट्टेबाजी जैसे कारण भी बताए हैं। यानी शक्कर की महंगाई पर राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन असली परीक्षा बाजार में कीमत कम करने की है।

‘प्यास लगने पर कुआं खोदने’ का तंज

सत्याग्रह के दौरान कांग्रेस जिलाध्यक्ष बालकृष्ण पाठक ने केंद्र सरकार द्वारा कच्ची शक्कर के आयात के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे ‘प्यास लगने पर कुआं खोदने’ जैसा कदम बताया। उनका कहना था कि आयातित शक्कर को भारत पहुंचने, रिफाइन होने और बाजार तक आने में समय लगेगा, जबकि आम उपभोक्ता आज महंगी शक्कर खरीदने को मजबूर है। दरअसल, केंद्र ने अगस्त में 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची शक्कर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। बाद में आयातकों की शिपिंग संबंधी दिक्कतों को देखते हुए कच्ची शक्कर को रिफाइन कर घरेलू बाजार में बेचने की समय सीमा भी बदली गई।

सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए भी उठाए कदम

महंगाई पर विपक्ष के हमले के बीच केंद्र रकार का कहना है कि कीमतों को नियंत्रित करने के लिए चीनी व्यापारियों पर स्टॉक सीमा लगाई गई है और मिलों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन किया जा रहा है। 1 सितंबर से थोक उपभोक्ताओं के लिए भी 15 दिनों की खपत से अधिक स्टॉक रखने पर रोक की व्यवस्था लागू की गई।
सरकार ने 15 सितंबर से चीनी डीलरों की स्टॉक सीमा 4,000 क्विंटल से घटाकर 2,000 क्विंटल करने की घोषणा भी की है, जिसका उद्देश्य जमाखोरी और कृत्रिम कमी पर अंकुश लगाना है।

महंगाई के बीच आंकड़ों का अपना खेल…

कांग्रेस का कहना है कि देश में करीब 28 लाख मीट्रिक टन मासिक खपत के मुकाबले पर्याप्त स्टॉक नहीं होने के बावजूद सरकार की नीतियों ने संकट बढ़ाया। दूसरी ओर, उद्योग के एक प्रमुख प्रतिनिधि ने अगस्त में कहा था कि देश में वास्तविक शक्कर की कमी नहीं है और हालिया तेजी में सट्टेबाजी व जमाखोरी की भूमिका अधिक हो सकती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2025- 26 में उत्पादन करीब 27.9 मिलियन टन रहा और घरेलू खपत लगभग 28-28.5 मिलियन टन रहने का अनुमान था। इससे तस्वीर साफ है कि शक्कर की कीमत बढ़ने की वजह एक ही नहीं है—उत्पादन, शुरुआती स्टॉक, त्योहारी मांग, निर्यात, इथेनॉल डायवर्जन, वैश्विक बाजार और जमाखोरी सभी कारक चर्चा में हैं।

कांग्रेस की मांग…अधिकतम खुदरा मूल्य तय करे सरकार…

बालकृष्ण पाठक ने सरकार से तत्काल अधिसूचना जारी कर शक्कर का अधिकतम खुदरा मूल्य 40 रुपये प्रति किलो निर्धारित करने और इससे अधिक कीमत पर बिक्री करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान करने की मांग की। महिला कांग्रेस अध्यक्ष सीमा सोनी ने भी महंगाई को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा और कहा कि बढ़ती कीमतों का सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग की रसोई पर पड़ रहा है।

सवाल यह नहीं कि आरोप किसका, सवाल यह कि राहत कब?

शक्कर की कीमतों पर कांग्रेस का सत्याग्रह अब राजनीतिक मुद्दा बन गया है। सरकार की ओर से स्टॉक सीमा, आयात और निगरानी जैसे कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन उपभोक्ता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल खुदरा बाजार की कीमत है। यदि सरकार का दावा है कि पर्याप्त स्टॉक है और जमाखोरी पर कार्रवाई हो रही है, तो फिर उपभोक्ता को सामान्य कीमत पर शक्कर कब मिलेगी? और यदि विपक्ष का दावा सही है कि नीतिगत फैसलों से संकट पैदा हुआ है, तो उन फैसलों की समीक्षा कब होगी? आखिर शक्कर का खेल आंकड़ों में कितना भी मीठा क्यों न दिखे, रसोई में महंगी शक्कर आम आदमी के लिए कड़वा सच बन चुकी है।

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