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29 Jul 2026
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फूलन देवी शहादत दिवस (25 जुलाई): वर्ण-जाति, वर्ग, पितृसत्ता और राज्यसत्ता से संघर्ष का एक प्रतीक,

फूलन देवी शहादत दिवस (25 जुलाई): वर्ण-जाति, वर्ग, पितृसत्ता और राज्यसत्ता से संघर्ष का एक प्रतीक,
फूलन देवी शहादत दिवस (25 जुलाई): वर्ण-जाति, वर्ग, पितृसत्ता और राज्यसत्ता से संघर्ष का एक प्रतीक,। फोटो: आज का दिन न्यूज़

25 जुलाई को फूलन देवी के शहादत दिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। भारतीय समाज में फूलन देवी का जीवन आज भी गहन बहस का विषय है। कुछ लोग उन्हें अपराधी के रूप में देखते हैं, तो अनेक लोग उन्हें सामाजिक अन्याय, जातिगत उत्पीड़न, लैंगिक हिंसा और वर्गीय शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध की प्रतीक मानते हैं। उनका जीवन भारतीय समाज की जटिलताओं और गहरे अंतर्विरोधों को समझने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।

फूलन देवी की आत्मकथा "I, Phoolan Devi: The Autobiography of India's Bandit Queen" उनके जन्म (1963) से लेकर 1994 में तिहाड़ जेल से रिहाई तक की जीवन-यात्रा का वर्णन करती है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के ग्रामीण उत्तर भारत में मौजूद जातिगत, लैंगिक और आर्थिक असमानताओं की भी गवाही देती है।

आत्मकथा का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि इसमें बचपन से ही अभाव, अपमान, घरेलू हिंसा, बाल विवाह, यौन हिंसा और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाओं का विस्तार से वर्णन है। एक बच्ची के रूप में विवाह, वैवाहिक हिंसा, बार-बार के उत्पीड़न और न्याय की अनुपस्थिति ने उनके जीवन को लगातार त्रासदी में बदल दिया। पुस्तक पढ़ते समय कई प्रसंग इतने पीड़ादायक हैं कि पाठक को बीच-बीच में रुकना पड़ता है।Example Image

लेखक के अनुसार, फूलन देवी का जीवन पढ़ते हुए उन्हें ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा "जूठन" और फ्रांसीसी लेखक विक्टर ह्यूगो के प्रसिद्ध उपन्यास "ले मिज़रेबल्स" (Les Misérables) की याद आती है। हालांकि, फूलन देवी के जीवन में जाति, वर्ग और लैंगिक उत्पीड़न का जो संयुक्त रूप दिखाई देता है, वह इसे और अधिक जटिल तथा भयावह बना देता है।

फूलन देवी मल्लाह समुदाय से थीं। उनका संघर्ष केवल गरीबी से नहीं था, बल्कि सामाजिक वर्चस्व, पितृसत्तात्मक व्यवस्था और स्थानीय सत्ता संरचनाओं से भी था। आत्मकथा में वर्णित घटनाएँ बताती हैं कि उस समय अनेक ग्रामीण इलाकों में कानून और संविधान की प्रभावशीलता सीमित थी तथा स्थानीय प्रभावशाली समूहों का दबदबा आम लोगों के जीवन को प्रभावित करता था।

किशोरावस्था में अपहरण, डकैत गिरोहों के बीच जीवन, विक्रम मल्लाह से जुड़ाव, फिर उनके मारे जाने के बाद कथित रूप से बेहमई में हुई यातनाएँ और उसके बाद 14 फरवरी 1981 की चर्चित बेहमई घटना ने फूलन देवी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया। इन घटनाओं को लेकर आज भी अलग-अलग ऐतिहासिक और कानूनी दृष्टिकोण मौजूद हैं।

1994 में रिहाई के बाद फूलन देवी ने लोकतांत्रिक राजनीति में प्रवेश किया और बाद में लोकसभा सदस्य भी बनीं। 25 जुलाई 2001 को दिल्ली में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

फूलन देवी का जीवन भारतीय समाज में जाति, वर्ग, लैंगिक हिंसा और न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व आज भी इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बहस का विषय बना हुआ है।

उनकी आत्मकथा उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है जो भारतीय समाज की संरचना, ग्रामीण सत्ता संबंधों और सामाजिक अन्याय को समझना चाहते हैं। यह पुस्तक केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस समय के सामाजिक यथार्थ की भी एक महत्वपूर्ण गवाही है।

25 जुलाई, शहादत दिवस पर फूलन देवी को विनम्र श्रद्धांजलि।

सिद्धार्थ रामू जी के फेसबुक वॉल से साभार।

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