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27 Aug 2026
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जहां कभी गूंजती थी गोलियों की आवाज, अब सुनाई दे रही मांदर की थाप; अबूझमाड़ में लौटी घोटुल की रौनक।

जहां कभी गूंजती थी गोलियों की आवाज, अब सुनाई दे रही मांदर की थाप; अबूझमाड़ में लौटी घोटुल की रौनक।
जहां कभी गूंजती थी गोलियों की आवाज, अब सुनाई दे रही मांदर की थाप; अबूझमाड़ में लौटी घोटुल की रौनक।। फोटो: आज का दिन न्यूज़

नक्सल प्रभाव में कमी के बाद अंदरूनी गांवों में फिर सजने लगे पारंपरिक घोटुल, लोकगीत और नृत्य से जीवंत हो रही आदिवासी संस्कृति

रायपुर, 27 अगस्त 2026। बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में सुरक्षा वातावरण में आए बदलाव के साथ आदिवासी समाज की प्राचीन और गौरवशाली घोटुल परंपरा एक बार फिर जीवंत होने लगी है। अंदरूनी गांवों, जैसे झारावाही, में ग्रामीण स्थानीय लकड़ियों और प्राकृतिक सामग्रियों से पारंपरिक घोटुल तैयार कर अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में जुटे हैं।

कभी नक्सली हिंसा और असुरक्षा के कारण शाम ढलते ही जिन गांवों में सन्नाटा छा जाता था, वहां अब मांदर की थाप, लोकगीत और सामूहिक गतिविधियों की आवाज सुनाई देने लगी है। यह बदलाव केवल सामाजिक गतिविधियों की वापसी नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के सांस्कृतिक जीवन में लौट रहे आत्मविश्वास की तस्वीर भी पेश करता है।

घोटुल: संस्कृति और सामाजिक शिक्षा की पारंपरिक पाठशाला

आदिवासी समाज में घोटुल का महत्व केवल एक सामुदायिक स्थल तक सीमित नहीं है। यह युवाओं को समाज की परंपराओं, अनुशासन, लोककला, सामुदायिक मूल्यों और जीवनोपयोगी दायित्वों से परिचित कराने वाला पारंपरिक केंद्र है।

घोटुल में बुजुर्ग पीढ़ी युवाओं को लोकगीत, नृत्य, संगीत और सामाजिक परंपराओं की जानकारी देती है। इस तरह पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत मौखिक परंपरा और सामूहिक सहभागिता के जरिए अगली पीढ़ी तक पहुंचती है।

नक्सल हिंसा के दौर में थम गई थीं सांस्कृतिक गतिविधियां

नक्सली हिंसा और अनिश्चितता के दौर में अबूझमाड़ के कई अंदरूनी इलाकों में ग्रामीणों की सामान्य दिनचर्या प्रभावित हुई थी। शाम होते ही लोगों को सुरक्षा की चिंता सताती थी और सामुदायिक गतिविधियां सीमित हो जाती थीं।

इसका असर घोटुल परंपरा पर भी पड़ा। युवाओं का सामूहिक रूप से घोटुल पहुंचना और वहां होने वाली सांस्कृतिक गतिविधियां कई जगहों पर लगभग थम गई थीं।

अब सुरक्षा वातावरण में सुधार और नक्सली प्रभाव में कमी के साथ ग्रामीणों में सुरक्षा की भावना मजबूत हुई है। इसके साथ ही पारंपरिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां भी धीरे-धीरे वापस लौट रही हैं।

‘चेलिक-मोटियारिन’ के लोकगीतों से गूंज रही शाम

अबूझमाड़ की शामें अपनी पारंपरिक सांस्कृतिक लय में लौट रही हैं। घोटुलों में ‘चेलिक-मोटियारिन’ के लोकगीत और मांदर की थाप सुनाई देने लगी है।

युवा इन गतिविधियों में भाग लेते हुए अपने बुजुर्गों से पारंपरिक गीत, नृत्य और सामाजिक तौर-तरीके सीख रहे हैं। इससे स्थानीय लोक संस्कृति को संरक्षित करने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास भी मजबूत हो रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों से फिर तैयार हो रहे घोटुल

अंदरूनी गांवों में ग्रामीण पारंपरिक तरीके से स्थानीय लकड़ियों और प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल कर घोटुल तैयार कर रहे हैं। यह प्रक्रिया स्वयं में सामुदायिक सहभागिता और स्थानीय ज्ञान का उदाहरण है।

ग्रामीणों के लिए घोटुल केवल एक भवन नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। इसके पुनर्जीवन से गांवों में सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल रहा है।

घोटुल की वापसी के साथ लौट रही सामान्य जिंदगी

सुरक्षा व्यवस्था में सुधार का असर अबूझमाड़ के सामाजिक जीवन में भी दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों की आवाजाही बढ़ने के साथ खेती-किसानी, हाट-बाजार और पारंपरिक त्योहारों से जुड़ी गतिविधियों में भी उत्साह लौटने लगा है।

घोटुलों में फिर जुटते युवा इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण तस्वीर पेश कर रहे हैं। यह संकेत है कि लंबे समय तक भय और असुरक्षा से प्रभावित रहे क्षेत्रों में सामान्य सामाजिक जीवन धीरे-धीरे अपनी पुरानी लय पकड़ रहा है।

शांति के साथ विकास की उम्मीद

ग्रामीणों का मानना है कि क्षेत्र में बने सकारात्मक वातावरण को स्थायी बनाने के लिए सुरक्षा के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क कनेक्टिविटी, रोजगार और संचार सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है।

अबूझमाड़ की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए स्थानीय परंपराओं, लोककलाओं और सामुदायिक संस्थाओं को मजबूत करना भी महत्वपूर्ण होगा। घोटुलों का पुनर्जीवन इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।

अबूझमाड़ में फिर सुनाई देने लगी मांदर की थाप इस बदलाव की जीवंत तस्वीर है। जहां कभी भय के कारण शामें सन्नाटे में गुजरती थीं, वहां अब लोकगीत, नृत्य और सामूहिक उल्लास आदिवासी संस्कृति की पुरानी धड़कन को फिर से जीवंत कर रहे हैं।

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