चिरमिरी । चिरमिरी के अधिवक्ता सुकुमार चटर्जी नेप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जंतर- मंतर पर हुए हिंसक प्रदर्शनों के मामलों को वापस लेने के सरकार फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है ।
अपने पत्र में सुकुमार चटर्जी ने कहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नागरिक अधिकार है। लेकिन जब कोई आंदोलन हिंसक रूप ले लेता है, या राष्ट्र गौरव अपमानित होता है। सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत सम्पत्ति की तोड़ फोड़ उपद्रव और सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मीयों पर मारपीट पर उतारू हो जाता है, तब कानून व्यवस्था और न्याय के मौलिक सिद्धांतो के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी करता है।
श्री चटर्जी ने पत्र में आगे कहा है कि जंतर मंतर पर हुए हिंसक प्रदशेनों के संदर्भ में जिन तथाकथित छात्र/प्रदर्शनकारियों पर तोड़ फोड़, और पुलिस बल के साथ मारपीट, हिंसा के आरोप है। उनके खिलाफ दर्ज मामलो को वापस लेने के सरकारी फैसले अथवा आश्वासन शासन की दृढ़ता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता ही है, आम भारतीय भी इसमें अपने आपको ठगा गया, सा अनुभव करता है।
श्री चटर्जी ने आगे कहा कि किसी भी सम्प्रभु एवं लोकतांत्रिक राष्ट्र में कानून का शासन सर्वोपरि होता है। विरोध करने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त एक पवित्र अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कभी भी हिंसा, तोड़फोड़ और अराजकता को छूट नहीं देता। इसके बावजूद सरकार द्वारा ऐसे संगीन मामले में दर्ज प्राथमिकों को वापस लेने का निर्णय एवं आश्वासन देना अत्यंत चिंताजनक है और ऐसे में मनोबल बढ़ते हुए अपराध को बढ़ावा मिलता है।
अधिवक्ता चटर्जी ने आगे कहा कि पुलिस बल एवं पुलिसकर्मी कानून व्यवस्था को बनाये रखने के लिए अपनी जान जोखिम में रखकर, काम करते है। जब हिंसक भीड़ द्वारा उन पर हमला किया जाता है, पथराव होता है या उन्हें शारीरिक चोट पहुंचाई जाती है। किसी भी दबाव से मुकदमा हटा दिये जाने से पुलिस का मनोबल गिरता है जिससे समाज में संदेश जाता है कि कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों की सुरक्षा और सम्मान से समझौता किया जा सकता है। जिससे एक गलत नज़ीर बनती है।
जंतर मंतर में तथाकथित छात्रों एवं उपद्रवियों, कॉकोच का आकोस एवं उनकी मांगे जायज हो सकती है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति और बातचीत का दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए था। लेकिन जो तत्व हिंसक गतिविधियों, तोड़फोड़ एवं मारपीट में सीधे तौर पर शामिल पाये गये है उन्हें केवल छात्र एवं प्रदर्शनकारियों का टेग देकर राहत नहीं दी जानी चाहिए तथा हिंसा में छूट किसी भी स्थिति में नहीं दी जा सकती।
अधिवक्ता सुकुमार चटर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह करते हुए पत्र में कहा है कि प्रकरण वापसी संबंधी दिये गये आश्वासन पर विचार करने के साथ ही इस संबंध में लिये जाने वाले फैसले पर पुर्नविचार किया जाना चाहिए और साक्ष्यों के आधार पर न्यायसंगत कार्यवाही सुरक्षित की जानी चाहिए ताकि लोकतंत्र में कानून के शासन की विश्वसनिता बनी रहे। किसी भी स्थिति में चिन्हांकित किये गये अपराधियों के प्रति नर्मी बरतना शासन के कमजोर फैसले को दर्शित करेगा। ऐसी स्थिति में समाज को विवश होकर माननीय सक्षम न्यायालय की शरण में जाना पड़ेगा।




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