कड़ाके की ठंड में बेजुबान जानवरों को ठंड से राहत दिलाने के लिए पार्षद राहुल भाई पटेल व समाजसेवी सदाशिव बारीक गोदरीपारा के सामुदायिक भवन के पास हर दिन जला रहे है अलाव,,,
चिरमिरी । जब कड़ाके की ठंड और घना कोहरा इंसानों को भी घरों में दुबकने पर मजबूर कर देता है, तब सड़कों और गलियों में रहने वाले बेजुबान जानवरों की पीड़ा शब्दों से परे होती है। ठिठुरती रातों में न उनके पास छत होती है, न गर्म कपड़े और न ही आग जलाने का कोई साधन। बस ठंड से बचने की एक अंतहीन जद्दोजहद ।
ऐसे कठिन समय में गोदरीपारा क्षेत्र के समाज सेवियों ने मानवता की लौ जलाकर बेजुवानों को जीवन की गर्माहट दी है। गोदरीपारा निवासी समाजसेवी सदाशिव बारिक 'शिबू' और वार्ड क्रमांक 34 के पार्षद राहुल भाई पटेल ने सांस्कृतिक भवन के समीप प्रतिदिन अलाव जलाने की ने व्यवस्था की है। यह अलाव केवल लकड़ियों से नहीं, बल्कि करुणा, संवेदना और इंसानियत से जल रहा है। इसकी तपिश से जहां राहगीरों को सर्दी से राहत मिलती है, वहीं ठंड से कांपते बेसहारा पशु भी इसके चारों ओर सुकून की सांस लेते ने नजर आते हैं।
जैसे ही शाम ढलती है और अलाव सुलगाया जाता है, आसपास के बेजुबान धीरे-धीरे वहां इकट्ठा होने लगते हैं। कोई चुपचाप आग के पास बैठ जाता है, तो कोई सिर झुकाकर जैसे अपने मददगारों का आभार व्यक्त करता है। यह दृश्य देखकर हर संवेदनशील हृदय पिघल उठता है और एहसास होता है कि प्रेम और अपनापन भाषा के मोहताज नहीं होते।
गोदरीपारा के पार्षद राहुल भाई पटेल ने भावुक स्वर में कहा कि पशु भी इस समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। वे बोल नहीं सकते, लेकिन दर्द, सर्दी और भूख उतनी ही महसूस करते हैं जितनी हम। उनके प्रति दया और सेवा करना हमारा नैतिक ही नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है और बेजुबानों की सेवा सबसे बड़ा पुण्य।
उन्होंने बताया कि यह सेवा भाव कोई एक दिन का नहीं, बल्कि पिछले पांच वर्षों से निरंतर जारी है। समाजसेवी सदाशिव बारिक हर वर्ष ठंड शुरू होते ही लकड़ियां इकट्ठा कर प्रतिदिन अलाव जलाते हैं, ताकि कोई भी बेजुबान ठंड से ठिठुरकर अपनी है। यह अलाव उन निरीह प्राणियों के लिए उम्मीद की किरण बन चुका है।
हालांकि नगर निगम द्वारा कुछ स्थानों पर सीमित सहायता मिलती है, लेकिन जरूरत उससे कहीं अधिक है। पार्षद राहुल भाई पटेल ने निगम प्रशासन और समाज के सक्षम लोगों से अपील की कि वे आगे आएं और सार्वजनिक स्थलों पर बेजुबान जानवरों के लिए सुरक्षित अलाव, चारा और पानी की व्यवस्था करें।
क्योंकि जिस समाज में बेजुबानों की पीड़ा को समझा जाता है, वही समाज सच मायनों में सभ्य और संवेदनशील कहलाता है ।
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