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06 Jul 2026
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पद्मविभूषण डॉ. तीजन बाई का जीवन भी महाभारत जैसा: तिरस्कार से विश्व मंच तक, संघर्ष की अमर गाथा,

पद्मविभूषण डॉ. तीजन बाई का जीवन भी महाभारत जैसा: तिरस्कार से विश्व मंच तक, संघर्ष की अमर गाथा,
पद्मविभूषण डॉ. तीजन बाई का जीवन भी महाभारत जैसा: तिरस्कार से विश्व मंच तक, संघर्ष की अमर गाथा,। फोटो: आज का दिन न्यूज़

पत्रकार राजेश अग्रवाल जी की फेसबुक वाल से साभार 

तेरह वर्ष की एक किशोरी, सिर पर तंबूरा, गले में दमदार स्वर और पैरों में गांव की धूल। छत्तीसगढ़ के चंद्रखुरी गांव में अस्थायी मंच पर खड़ी तीजन बाई ने पहली बार 'कापालिक' शैली में पंडवानी गाई। भीम की गर्जना, द्रौपदी का क्रोध और कृष्ण की नीति। सब कुछ उनके स्वर में इतना सजीव हो उठा कि श्रोताओं की भीड़ स्तब्ध रह गई। महाभारत की कथा सुनाने वाली यह पहली महिला थी, जिसे समाज ने 'अवैध' ठहराया था। उस रात उन्हें मात्र दस रुपये मिले, लेकिन उसी क्षण एक ऐसी आवाज जन्मी जिसने बाद में पूरे विश्व को छत्तीसगढ़ की लोकधारा से परिचित करा दिया।

6 जुलाई को छत्तीसगढ़ की धरती पर लोककला के एक युग का अंत हो गया। पद्मविभूषण डॉ. तीजन बाई, पंडवानी की महारानी, जिनकी दमदार आवाज ने महाभारत के पात्रों को मिट्टी की खुशबू और लोकजीवन की सजीवता से जोड़कर विश्व पटल पर छत्तीसगढ़ की लोकधारा को अमर बना दिया।

तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में पारधी आदिवासी समुदाय में हुआ था। पिता हुनुक लाल और माता सुखवती की पहली संतान, गरीबी की मार झेलती यह बालिका बचपन से ही महाभारत की कथाओं में रमी हुई थी। तीज पर्व के दिन जन्म लेने के कारण उनका नाम 'तीजन' पड़ा। कला के प्रति जुनून इतना प्रबल था कि सामाजिक बहिष्कार, प्रारंभिक विवाह की विफलता और आर्थिक संकट कुछ भी उन्हें रोक नहीं सका।

समाज ने उन्हें तिरस्कृत किया क्योंकि पंडवानी परंपरागत रूप से पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। पहले विवाह में विफलता के बाद वे अपने समुदाय से बहिष्कृत हो गईं। एक छोटी-सी झोपड़ी बनाकर, पड़ोसियों से बर्तन-भांडे उधार लेकर उन्होंने अपनी साधना जारी रखी। यह संघर्ष उनकी कला को निखारने वाला तप बन गया।

तीजन बाई ने पंडवानी की दोनों प्रमुख शैलियों- 'कपालिक' (खड़े होकर नाटकीय प्रस्तुति) और 'वेदमती' (बैठकर), को अपनी अनोखी छाप दी। तंबूरा, मंजीर, ढोलक और चिमटे की साथ में उनकी आवाज जब महाभारत के पात्रों को जीवंत करती, तो श्रोता स्वयं को कुरुक्षेत्र के मैदान में पाते। भीम का क्रोध, अर्जुन का संशय, द्रौपदी की पीड़ा..., सभी उनके हाव-भाव और स्वर में इतने प्राणवान हो उठते कि दर्शक भाव-विभोर हो जाते।

उनकी प्रसिद्धि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैली। श्याम बेनेगल की 'भारत एक खोज' श्रृंखला में उनकी प्रस्तुतियां यादगार बनीं। उन्होंने फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, इंग्लैंड, इटली, जापान समेत अनेक देशों में सैकड़ों कार्यक्रम प्रस्तुत किए। जहां कहीं भी वे गईं, छत्तीसगढ़ की मिट्टी की महक और महाभारत की शाश्वत कथाएं उनके साथ पहुंचीं।

1988 में पद्म श्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण। ये सम्मान उनकी कला की मंजिल थे। वे छत्तीसगढ़ की पहली पद्म विभूषण कलाकार बनीं। 2018 में जापान का फुकुओका पुरस्कार उनके सांस्कृतिक योगदान को वैश्विक मान्यता दिलाने वाला था। खैरागढ़ विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त हुई।

लेकिन इन पदकों से कहीं बड़ा उनका योगदान था, पंडवानी को लोककला से उठाकर शास्त्रीय स्तर पर स्थापित करना और युवा पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ना। उन्होंने अनेक शिष्याओं को प्रशिक्षित किया, जिससे यह कला उनके बाद भी जीवित रहेगी।

तीजन बाई का जीवन महाभारत की कथाओं जितना ही संघर्षपूर्ण था। तीन विवाह, सामाजिक तिरस्कार, गरीबी और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अंतिम दिनों में फेफड़ों की गंभीर बीमारी, सेप्सिस और किडनी की समस्या से जूझते हुए भी उनकी चेतना कला से जुड़ी रही। 27 मई से एम्स रायपुर में भर्ती होने के बाद 5 जुलाई की सुबह 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।

गनियारी गांव में उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोगों ने नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी आवाज अब भौतिक रूप से सुनाई नहीं देगी, लेकिन उनकी कथाएं, उनकी गाथाएं, उनकी वह दमदार स्वर लहरी पीढ़ी दर पीढ़ी गूंजती रहेगी।

तीजन बाई ने साबित किया कि कला की कोई जाति, लिंग या सीमा नहीं होती। एक आदिवासी लड़की की आवाज ने पूरे राष्ट्र को गौरवान्वित किया। आज जब हम उनकी स्मृति में नतमस्तक होते हैं, तो महसूस करते हैं कि महाभारत की कथाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। वे मात्र रूप बदलती हैं। तीजन बाई का रूप अब अमर हो चुका है।

उनकी विरासत छत्तीसगढ़ की मिट्टी में, भारतीय लोककला में और हर उस मनुष्य के हृदय में जीवित रहेगी, जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने और अपनी साधना को अडिग रखने का संदेश लेता है।

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