क्या आपको महसूस हो रहा है कि गर्मी का 'मिजाज' बदल गया है? अक्सर हम थर्मामीटर के पारे (तापमान) को देखकर गर्मी का अंदाजा लगाते हैं, लेकिन असल खतरा उस आंकड़े में नहीं, बल्कि हवा में घुली उस 'उमस' में छिपा है जो आपके शरीर को अंदर से झुलसा रही है।
Climate Central की एक नई और डरावनी रिपोर्ट ने भारत समेत पूरी दुनिया को सचेत कर दिया है: खतरनाक उमस भरी गर्मी अब एक दुर्लभ घटना नहीं, बल्कि आपकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही है।
क्या है असली खतरा?
हमारा शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा रखता है। जब पसीना त्वचा से वाष्पित (evaporate) होता है, तो शरीर का तापमान कम होता है। लेकिन उमस भरे दिनों में हवा में नमी इतनी ज्यादा होती है कि पसीना सूख ही नहीं पाता। नतीजा—शरीर की गर्मी अंदर ही कैद हो जाती है, जिससे हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी गंभीर खतरे पैदा हो जाते हैं।
रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े
दोगुना हुआ संकट: 1970 के दशक में दुनिया भर में साल में औसतन 10 दिन ऐसे होते थे जब उमस का स्तर खतरनाक होता था। आज यह संख्या बढ़कर 23 दिन हो गई है।
इंसानी दखल: 1970 के बाद से दर्ज 64% खतरनाक उमस भरे दिनों के पीछे सीधे तौर पर 'मानवजनित जलवायु परिवर्तन' (Climate Change) का हाथ है।
वर्ष 2025 का हाल: पिछले साल दर्ज किए गए 23 खतरनाक उमस भरे दिनों में से 83% (19 दिन) केवल जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हुए थे।
भारत पर मंडराता 'वेट बल्ब' खतरा
वैज्ञानिक खतरनाक उमस को मापने के लिए वेट बल्ब तापमान (Wet Bulb Temperature) का उपयोग करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 25°C या उससे अधिक का वेट बल्ब तापमान स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
तटीय शहरों के लिए चेतावनी: मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, विशाखापट्टनम और कोच्चि जैसे तटीय शहरों में रहने वाले लोग पहले से ही उमस की इस मार को झेल रहे हैं।
मैदानी इलाकों का हाल: गंगा के मैदानी इलाकों में मानसून से पहले और बाद में बनने वाली 'चिपचिपी गर्मी' शरीर की सहनशक्ति को उसकी सीमाओं के करीब धकेल रही है।
किसे है सबसे ज्यादा खतरा?
जलवायु परिवर्तन की यह मार सबके लिए समान नहीं है। सबसे अधिक जोखिम में हैं:
बुजुर्ग और बच्चे।
गर्भवती महिलाएं।
पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोग।
वे लोग, जिनके पास कूलिंग सिस्टम (AC/Cooler) की सीमित पहुंच है।
विशेषज्ञों की राय
Climate Central की वैज्ञानिक केटलिन ट्रूडो कहती हैं, खतरनाक उमस अब दुर्लभ नहीं रही, यह मानव शरीर की सहनशक्ति की सीमाओं को चुनौती दे रही है। वहीं, बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. लिसा पटेल का मानना है कि यह रिपोर्ट एक बड़ी चेतावनी है कि हमने प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ किया है, उसके असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
अब समय आ गया है कि हम केवल तापमान (डिग्री सेल्सियस) को न देखें, बल्कि हवा की नमी और उमस को भी 'खतरे की घंटी' के रूप में पहचानें। जलवायु परिवर्तन केवल एक भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि आपके आज की वह तपन है जो पसीने को सूखने नहीं देती।




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