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काव्य कलश: एक न एक दिन मरना तो है !

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मरना तो है एक न एक दिन , 

हमारे मरने से किसी को 

क्या फ़र्क पड़ता है ?

हम चाहे किसी रसूखदार ,

बाहुबली की चमचमाती गाड़ियों 

के काफ़िले से कुचलकर 

मरें या किसी होटल के 

मुसाफ़िर की तरह आधी रात को

किन्हीं  ताकतवरों की बन्दूक से मरें , 

मरना हमारी नियति है। 

हमारे मरने के बहाने  घड़ियाली आँसू 

बहाना उनकी फ़ितरत है ,

हम हैं इस देश के साधारण लोग।

बेमौत मरना ही  हमारी किस्मत है ! 

हमें मारकर अट्टहास करते 

अपनी आलीशान कारों में

शान से घूमते हैं  सफ़ेदपोश ,

ताकत के नशे में चूर , मदहोश ।

वो ही तो हैं इस लोकतंत्र के  पहरेदार 

जन -गण -मन के अधिनायक ,

भारत भाग्य विधाता।

जिन्हें जन्म देकर अपनी बदकिस्मती पर 

ख़ामोशी से रो रही है भारत माता।

         --- स्वराज करुण

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